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सोमवार, 6 अगस्त 2012

मेरा हमदम, मेरा दोस्त

रमेश और सुरेश बीच में छड़ी दिखा रहे हैं जुगल किशोर।
 फ्रेंडशिप डे के एक दिन पूर्व मेरा बचपन का मित्र मुझसे बिछड़ गया। उसका और मेरा काफी लंबा साथ रहा। 1960 से हम खरगोन में दोस्त बने थे। फिर वह इंदौर चला आया अध्ययन के लिए। 1967 में मैं भी इंदौर आ बसा और हमारी दूरी फिर दूर हो गई। एक के बाद एक मेरे दो दोस्त और इंदौर आ गए। हमारी चारों की चौकड़ी यहाँ भी अच्छी जमती रहती थी। एक पखवाड़े पूर्व सूचना मिली कि रमेश पुरे को चेस्ट पेन हुआ और फटाफट एंजियोप्लास्टी भी हो गई। श्रीमान  अब घर पर आराम फरमा रहे हैं।  उस समय सिर में फोड़ा होने से मैं भी अस्वस्थ था, इसलिए मिलने नहीं जा सका। आज कल करते-करते टलता रहा, यह क्या पता था कि वह जल्दी में है। शायद उसने काफी इंतजार किया था मेरे आने का। एंजियोप्लास्टी से पूर्व मेरी उसके साथ फोन पर लंबी चर्चा हुई थी। उसने मुझे बारिश कब-कब आएगी ये तिथियाँ बताई थी। उन तिथियों को अच्छी बरसात हुई भी। वह ज्योतिष का अच्छा जानकार था। उसने अपनी पत्रिका देख कर परिवार को भी आगाह कर दिया था कि चार अगस्त का दिन उसके लिए क्रिटिकल है, यह दिन अगर सुरक्षित गुजर गया तो 76 साल तक जिउंगा। लेकिन नियति को शायद इतना लंबा जीवन मंजूर नहीं था। दो दिन पहले उसने बर्वे साहब से कहा था-मृत्यु को हँसते-हँसते अंगीकार करना चाहिए। न खुद ज्यादा कष्ट भोगो न परिवार को तकलीफ दो। और सचमुच उसने ऐसा ही किया। रमेश, सुरेश, सत्येन्द्र और जुगल का चतुर्भुज अब त्रिभुज बन चुका है। अब बस रमेश की यादें बाकी हैं। सगुण दोस्ती का अध्याय खत्म, अब निर्गुण की ओर कदम बढ़ चुके हैं। जाते-जाते वह नेत्रदान कर गया, अब उन आँखों से कोई और देखेगा लेकिन नजरिया क्या वही होगा। वह जिंदादिल था और हर फिक्र को धुँए में उड़ाता था। मैंने उससे सिगरेट छोड़ने का कईं बार आग्रह किया, लेकिन असफल रहा। एंजियोप्लास्टी ने उसकी सिगरेट छुड़ा दी। मगर सिगरेट से बिछोह शायद वह बर्दाश्त नहीं कर सका। उसने प्रेम विवाह किया था और ताउम्र उसे निभाया। परिवार के लोग इस अंतरजातीय रिश्ते के खिलाफ थे। हम मित्रों ने मिल कर आर्य समाज मंदिर में उसके फेरे करवाए थे। हमारे एक मित्र डा.केएल भार्गव के निवास पर रिसेप्शन रखा गया था। नईदुनिया से अभयजी सहित कई गणमान्य लोगों ने वर-वधु को आशीर्वाद दिया। उन दिनों अंतरजातीय विवाह का साहस बिरले ही करते थे। जिस वैष्णव पोलिटेकनिक से उसने डिप्लोमा किया वहीं पर वह अध्यापन करते हुए सेवानिवृत हुआ था। आज वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसके साथ गुजारे लम्हों की लंबी फेहरिस्त है।

1 टिप्पणी:

  1. " स्व. रमेश पुरे " सर की स्मृति को मेरा नमन और सादर श्रद्धांजलि ....

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