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गुरुवार, 27 अक्तूबर 2011

वह दिवाली कभी तो आएगी


यह दीपावली भी धमाधम पटाखों की आवाज के साथ गुजर गई। वातावरण में विषाक्त गैसों का जहर छोड़ गई। राऊ, मुजफ्फऱपुर, मुरादाबाद आदि जगहों पर पटाखों के विस्फोट में शहीद हुए लोगों की कुर्बानी को लोग बहुत जल्दी भूल गए और जोश-खरोश के साथ पटाखे चलाए। न बीमार का ध्यान रखा न पर्यावरण की चिंता की। अमावस की पूरी रात धमाधम होती रही। ग्रेनेड(लड्डू), चकरी(चकली), अनार(अनारसे), लड़(सेव) और नाना प्रकार के मीठे-नमकीन इन पटाखों ने पेट का सत्यानाश किया। मिलावटी मावे और सिंथेटिक घी से भी नहीं डरे लोग। बे खौफ होकर इन्हें उदरस्थ किया। बरस-दर-बरस न जाने कितनी दिवालियाँ इसी तरह दिवाला पीट कर गुजर जाती हैं। लेकिन लोग नहीं सुधरते और न ही सुधरना चाहते। मैंने अपने बेटे से कहा-अब तुम बड़े हो गए हो। होश संभालो, पटाखे मत चलाओ। उसकी समझ में शायद बात आ गई। उसने इस वर्ष पटाखे नहीं चलाए। पर्यावरण को लेकर क्योटो(जापान) में विगत वर्षों में एक सम्मेलन हुआ था। इसमें एक प्रोटोकाल मंजूर किया गया था। जो उद्योग या संयंत्र प्रदूषण कम फैलाते हैं उन्हें क्योटो प्रोटोकाल के अनुसार कार्बन क्रेडिट मिलती है। अर्थात प्रदूषण कम फैलाने का पुरस्कार। मैंने भी अपने बेटे से कहा-तुमने इस वर्ष पटाखे नहीं चलाए, इसलिए मैं भी तुम्हें कार्बन क्रेडिट दूँगा। उम्मीद है लोगों में समझदारी कभी न कभी तो आएगी। और किसी दिन लोग शायद प्रदूषण मुक्त, सेहतमय दिवाली की शुरूआत करेंगे।

2 टिप्‍पणियां:

  1. lagatar andhvishvason ke khilaf bolte rahne se jyada thik hai unke khilaf khada hona ... maine bhi is sal yahi kiya ... hamri thos koshish hi auron ke liye prerana banati hai ... dhanyvad !!!!

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  2. बधाई हो आपको पटाखे नहीं चलाने के लिये... इस साल तो मैंने भी स्वविवेक से न तो पटाखे खरीदे...ना जलाऎ...सोचा इतना पैसा किसी गरीब की जेब में जाऎगा तो उसका भला होगा...मैंने इस बार जैनियों को भी पटाखे चलाते हुऎ नहीं देखा... धीरे-धीरे ये कुप्रथा भी काफी कम हो जाऎगी...

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