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शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

हमारे आंगन में बुलबुल और बच्चे

हमारे घर के आंगन में एक चम्पा का पेड़ है। एक दिन उसकी डाली पर चिड़िया का घोसला बना दिखाई दिया। तिनकों की मदद से करीने से बने कटोरीनुमा घोसले में अगले दिन तीन भूरे रंग के अंडे नजर आए।
अब अंडों को सेने के लिए किसी तपस्वी की तरह चिड़िया दिन रात वहां बैठी रहती थी। मेरे पौत्र आशयजी ने जब चिड़िया को इस हालत में देखा तो वह कहने लगा दादा लगता है चिड़िया मर गई। न हिलती है न कभी उड़ती है। उसने पहली बार ऐसा देखा था, इसलिए समझ नहीं पा रहा था। मैंने उसे समझाया कि अभी चिड़िया अंडों को अपने बदन की गर्मी से पका रही है। जब अंडे पक जाएंगे तो उसमें से नन्हें-नन्हें चूजे निकलेंगे। दो-तीन दिन बाद सचमुच एक चूजा दिखाई दिया। चिड़िया शायद उसके लिए भोजन लेने कहीं गई थी। आशय महाशय नन्हे चूजे
को देख कर बहुत प्रसन्न हुए। एक दो दिन बाद दूसरे और तीसरे अंडे से भी चूजे निकल आए। हमने तीनों स्टेज की तस्वीरें अपने कैमरे में कैद कर लीं। अब दिलीप चिंचालकरजी द्वार आशय को भेंट की गई हमारे आसपास के पक्षी पुस्तक खोल कर देखी। डा. देवकीनंदन मिश्रराज की इस पुस्तक में उस चिड़िया का चित्र और ब्योरा मिल गया। असल में यह भारतीय बुलबुल है, जो गौरैया जैसी दिखाई देती है। सिर पर काला जूड़ा और पूंछ के नीचे लाल पंखों का गुच्छा रहता है। पुस्तक के अनुसार इसे पंजाब से लेकर बंगाल और उत्तराखंड से लेकर गोदावरी घाटी तक बुलबुल के नाम से जाना जाता है। दूम के नीचे लाल पंखों के कारण कुछ लोग इसे गुल दुम भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे रेड वेंटेड बुलबुल कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम पिक्टोनाॅटस कैफर है। ईरानी बुलबुल से इसका कोई रिश्ता नहीं है, वह तो प्रवासी पक्षी के रूप में हमारे सुदूर उत्तरी क्षेत्र में कभी-कभार दिखाई दे जाती है। उसे अंग्रेजी में नाइट इंगेल कहते हैं। ऐसा किस्सा है कि नूरजहां ने कुछ बुलबुलें ईरान से मंगवा कर कश्मीर की वादियों में छुड़वाई थीं, मगर यहां की आबोहवा उसे रास नहीं आई। हमारी बुलबुल गौरैया की तरह की एक चिड़िया है, जो घरों के आसपास बिखरे अनाज के दाने और फसलों के कीड़े-इल्ली आदि खाकर अपना जीवन यापन करती है। स्वभाव से यह एक झगड़ालु पक्षी है, जो अपने आसपास के अन्य परिंदों से लड़ती रहती है। हमने परिंदों के लिए हमारी गैलरी में गमलों के बीच एक ट्रे रखी है। जिसमें रोज बाजरा डाल देते हैं। गिलहरी, चिड़ियां और फाख्ताएं रोज इसमें चुग्गा चुगती हैं। कभी-कभार तोते भी आ जाते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सुनील त्रिवेदी6 सितंबर 2014 को 2:04 am

    बहुत अच्छा प्रयोग

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  2. हमारे भी आंगन में बुलबुल और बच्चे का घोंसला

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