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गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

आप दवा नहीं जहर खा रहे हैं

3 अक्टूबर 2013 को अखबारों में पढ़ा कि अगले छः महीनों में नई दवा नीति लागू होने से दवाइयाँ सस्ती होगीं। इस खबर में यह भी लिखा था कि आई मैकिन्से की एक रपट के अनुसार 2025 तक औसत पारिवारिक बजट का 13 प्रतिशत स्वास्थ्य संबंधित जरूरतों पर खर्च होगा। वर्तमान में हमारा घरेलू दवा बाजार 70 हजार करोड़ रुपए तक जा पहुंचा है। बाप रे बाप। कहाँ आ गए हम। प्रकृति से दूरी ने आज मनुष्य के जीवन में कितनी विकृतियाँ भर दी कि बिना दवा के उसका चलना दुभर हो चुका है। कईं घरों में तो मैंने देखा लोग हर माह चार से पांच हजार रुपए की दवाएं ही खा जाते हैं। उनके बजट का बड़ा हिस्सा भोजन के बजाए दवा-दारु पर खर्च होता है। बाजारवाद की जीवनशैली ने मानव शरीर को बीमारियों का भंडार बना कर रख दिया है। कोई भी यह दावे के साथ नहीं कह सकता कि वह पूर्ण स्वस्थ है या दवा नहीं खाता। गलत आहार-विहार वाली जीवनशैली शरीर में अनेक रोगों को न्यौता दे रही है। किसी को मधुमेह ने जकड़ रखा है तो किसी को जोड़ों के दर्द ने। कोई उच्च रक्तचाप से परेशान है तो किसी को दिल का दर्द परेशान कर रहा है। दिन पर दिन नित नए अस्पताल और नर्सिंग होम खुल रहे हैं और उनमें लोग अपनी कमाई को होम कर रहे हैं। सवा सौ करोड़ की आबादी में 70 हजार करोड़ रुपए केवल और केवल दवाओं पर खर्च हो रहे हैं। क्या इस स्थिति को सुखद कहा जा सकता है। पुरानी कहावत है पहला सुख निरोगी काया। लेकिन सुख की खातिर माया के फेर में फंसा मानव इस पहले सुख से तो सर्वथा वंचित ही हो चुका है। इसके बाद बाकी सुख मिले भी तो किस काम के। क्या यही विकास है जो मनुष्य जीवन को विनाश के मार्ग पर धकेल रहा है। इस पर गर्व करें या रोएं। अब भी देर नहीं हुई है, मनुष्य अगर अपनी जीवनशैली सुधार ले, तो कईं रोगों के चंगुल से बच सकता है। ये दवाएं एक रोग को तो दबा देती हैं और दूसरे अनेक रोग पैदा कर देती हैं। असल में आप पैसे देकर
दवा नहीं जहर खा रहे हैं। 

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