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रविवार, 26 मई 2013

बयालिस साल बाद बदली डगर

नईदुनिया के केसरबाग स्थित कार्यालय में प्रथम पृष्ठ
प्रभारी ठाकुर जयसिंह और हम सहयोगी
निष्ठावान संपादक माणिकचंद वाजपेयी के सानिध्य में स्वदेश से मैंने पत्रकारिता का ककहरा सीखा और बयालिस साल पहले नईदुनिया में प्रवेश किया। राहुल बारपुते, रनवीर सक्सेना, राजेन्द्र माथुर और अभय छजलानी जैसे प्रखर सम्पादकों के सानिध्य में एक अखबार में एक ही डेस्क पर कार्य करते उम्र के चार दशक गुजर गए। इस बीच अनेक साथी सम्पादक आते और जाते रहे, लेकिन मेरी निष्ठा नईदुनिया के प्रति अंगद के पांव की तरह जमीं रही। आज नए साथियों से बात करता हूं तो पता चलता है कोई नौ तो कोई अठारह नौकरियां बदल चुका है। बाजारवाद में निष्ठा अपना मूल्य खोती जा रही है। नौकरियां बदलना गुणवत्ता का नया मानदंड बन गया है। सब माया-मोह का फेर है। जोगी माया के मोह से बचने के लिए रमता है, तो ये नव जोगी करियर व माया के मोह में रमते रहते हैं। वैसे निष्ठा का अतिरेक भी व्यक्ति को मोहपाश में जकड़ देता है। अपनों के मोह में फंसा वह अन्यत्र जा नहीं पाता। यही स्थिति मेरी भी रही।
गत वर्ष नईदुनिया का स्वामित्व जागरण समूह ने संभाल लिया और श्रवण गर्ग प्रधान संपादक बन कर आए। यह नईदुनिया में उनकी दूसरी पारी है। पहली पारी में भी मैं साथ था। वैसाख पूर्णिमा पर 25 मई 2013 को नईदुनिया लालबाग का सामिप्य छोड़ कर मनमंदिर काम्प्लेक्स में चला आया। मैं समझ रहा था कि यह नईदुनिया का चौथा पड़ाव है। लेकिन बिदाई के लिए जब अभयजी से मिला, तो उन्होंने बताया कि चौथा नहीं छठा पड़ाव है। कड़ावघाट व किबे कम्पाउंड से पूर्व नईदुनिया खजूरी बाजार व राजबाड़ा क्षेत्र से निकलता था।
मेरा इंदौर आगमन 1967 में हुआ इसलिए केसरबाग के अलावा बाकी इलाकों के दफ्तरों से मेरा कभी वास्ता नहीं पड़ा। बयालिस साल तक मैं केसरबाग रोड वाले दफ्तर में ही नियमित सेवा देता रहा। 5 जून को नईदुनिया का स्थापना दिवस है। नईदुनिया 66 वर्ष पूर्ण कर 67 वें वर्ष में प्रवेश करेगी।
अब डगर बदल गई। पश्चिम के बजाय पूर्व दिशा की ओर घर से दफ्तर के लिए निकलना पड़ता है। सतत एक ही रास्ते से गुजरते-गुजरते हर मोड़, मकान और दूकान मार्ग की माला के मनकों की तरह हो जाते हैं। मनका-मनका फेरते मंजिल कब आ जाती है पता ही नहीं चलता। रात को वापसी में सड़क के श्वान भी दूम हिला कर सलामी की मुद्रा में मिलते हैं। आपका वाहन भी रास्ते के गड्डे और टिबड्डों से जान पहचान कर लेता है। नई डगर पर एक नया ही इंदौर आकार ले चुका है। यहां बाजारवाद की फसल माल और मल्टियों के रूप में लहलहा रही है। इस मार्ग के मध्य में बीआरटीएस की गंगा बहती है। पुराने मार्ग पर दोपहिया वाहनों का सैलाब था, यहां चौपहियों का चरागाह है। उनके बीच कभी कोई साइकल या लूना भूले भटके आ जाए, तो वे बड़ी हिकारत से हार्न बजाते हैं।
नईदुनिया के सिटी रिपोर्टर गोपीकृष्ण गुप्ता के साथ
सहयोगी उमेश त्रिवेदी का जब शरद पंडित फोटो
ले रहे थे तो महेश जोशी और मैंने बीच घुस कर
मजा बिगाड़ दिया।
चौथे माले पर नया दफ्तर एकदम कारपोरेट लुक वाला है। नए दफ्तर में पहला दिन फर्स्टलीड के संकट से शुरू हुआ। बार-बार सिस्टम फेल का चक्कर अलग। अचानक संपादकजी चेम्बर से बाहर आए और बताया कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर बड़ा नक्सली हमला हो गया है। कईं नेता मारे गए या अगवा कर लिए गए। अहिंसा का संदेश देने वाले भगवान बुद्ध के जन्म, बोध और निर्वाण दिवस पर नक्सलियों ने हिंसा का तांडव मचाया और हमारी बांछें खिल गईं कि फर्स्टलीड तो क्या बैनर लाइन मिल गई। पत्रकारों का भी बड़ा अजीब जीवन है। कहीं विप्लव, विनाश या विध्वंस हो तो पत्रकार प्रसन्न होता है। जैसे वेटिंग रूम में मरीजों की भीड़ देखकर डाक्टर खुश होते हैं। बहरहाल इस खबर को संजोने में रात के साढ़े बारह बज गए। जब घर लौटा तो नई डगर पर दिशा भ्रम होने से मार्ग भटक गया और घर पहुंचते-पहुंचते रात के डेढ़  बज गए। अखबारनवीसों का जीवन रात में जागते-जागते ही बीत जाता है। न सुबह का सूर्योदय नसीब होता है न शाम का सूर्यास्त। जिस दिन घर जल्दी जाना हो जरूर देर होती है और पत्नी मुंह फुलाए बैठी मिलती है। पत्रकारों की पत्नियां भी शायद सोचती होंगी किससे पाला पड़ा।

1 टिप्पणी:

  1. padha aapki kalam se pahali dafa smritiyon ka aessssssssssssssssa shant aur niruwaig pravah,... sachmuch hi aanand aaya

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