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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

हमारी जान से मत खेलो सरकार


इन दिनों इंडोसल्फान को लेकर राष्ट्रीय बहस छिड़ी है। यह एक प्रकार का वाइड स्पैक्ट्रम कीटनाशक है, जिस पर अमेरिका, ब्राजील, आस्ट्रेलिया और योरपीय यूनियन सहित 80 देश प्रतिबंध लगा चुके हैं। लेकिन भारत में इसका प्रयोग किसान भाई धड़ल्ले से करते हैं। केरल के कसरगोड जिले में काजू की खेती पर इसका जमकर छिड़काव हुआ और जब जान पर बन कर आई तो राज्य सरकार ने राज्य भर में इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित कर दिया। केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने राष्ट्रभर में बंदिश की माँग को लेकर एक दिन का अनशन भी किया। वामदलों के सांसद संसद के सामने विरोध प्रदर्शन कर प्रधानमंत्री को ज्ञापन दे चुके हैं। भाजपा की नेत्री सुषमा स्वराज भी प्रतिबंध लगाने के पक्ष में हैं। लेकिन केरल की तरह भाजपा शासित राज्य सरकारें यह पहल करके नहीं दिखाती। ऐसी दोहरी नीति किस काम की। 2010 में स्टाकहोम सम्मेलन में आर्गेनिक पोल्यूटेंट रिव्यू कमेटी ने खतरनाक रसायनों की सूची में इसे भी शामिल करने की सिफारिश की थी। किसी रसायन के खतरनाक होने का मानक इस स्तर पर तय किया जाता है कि वह पर्यावरण में कितनी देर रहता है। अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी के अनुसार इंडोसल्फान सबसे ज्यादा समय तक पर्यावरण में मौजूद रहता है। यह फसलों पर छिड़काव के कारण खाद्य पदार्थों में संघनित रूप में पाया जाता है। इससे न्यूरोलाजिकल प्राब्लम्स और कैंसर का खतरा बताया जाता है।
-भारत में सालाना इसका उत्पादन 9000 टन होता है। आधी खपत देश के किसानों में ही हो जाती है। सीमांत व लघु किसान इसका लपक कर इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि यह सस्ता है। कीटों पर इसका व्यापक प्रभाव है, इसीलिए इसे ब्राड स्पैक्ट्रम कीटनाशक की श्रेणी में रखा जाता है। यह आर्गेनो क्लोराइड समूह में आता है, जिसमें डीडीटी भी है। डीडीटी पर प्रतिबंध लग चुका है तो फिर इस पर क्यों नहीं। यह तो गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज वाली बात हुई। पता नहीं हमारी सरकार कब तक हमें इसी तरह जहर खिलाती रहेगी।
पुनश्चः केरल के मुख्यमंत्री ने देश के सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर इंडोसल्फान पर अपने-अपने राज्यों में बंदिश लगाने का अनुरोध किया है। हमारे कृषिमंत्री भी उनसे सहमत हैं, लेकिन प्रतिबंध के लिए केन्द्र के पाले में गेंद फैंक दी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सरकार बदनाम तो नहीं .. कहीं हमारे लिए ..प्रतिबन्ध लगाने में देरी सरकार जब कर ही रही है तो उसे ऐसा करने का कारण जनता के सामने रखना चाहिए ... नहीं तो अनायास ही वह दोष का भागी बनती है ... क्योंकि कई बार ऐसा होता हुआ देखा गया है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ किसी नए रसायन को बेंचने के चक्कर में पुराने को प्रतिबंधित करवा देती है .. खैर रसायन कोई भी हो बुरा है .. पर रसायनों के बगैर हमारी खेती की उत्पादकता कैसे अप्रभावित रहेगी इसपर कोई ठोस खोज होना अभी बाकि है .. और प्रायोगिक स्तर पर है ... इस काम में भी तेजी लाना चाहिए / अभी हाल ही में मिडिया ने एक खिलाडी अरुणिमा को लेकर बहुत जल्दी में सनसनी फैलाई .. और बाद में मामला ही कुछ और नजर आता दिखा .. पर सरकार बेवजह बदनाम हुई ... इसलिए जो भी करो तुरंत सबको बताया जाय .. सरकार घबराये नहीं ... सच को छुपाना अब आसान नहीं ..और झूठ के पांव नहीं ...

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  2. sarkar kahan ghabrati hai.... lekin is tarah ki cheejon par turant rok lage, europe aur america me ab tak n jaane kya hogaya hota is haalat me...

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