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सोमवार, 6 दिसंबर 2010

बिना रोग उभार, नहीं उपचार

क्या बिना रोग उभार के संभव है स्वास्थ्य में सुधार? शायद नहीं। बिना रोग उभार के रोग का निवारण हो ही नहीं सकता। होमियोपैथी में भी जब दवा दी जाती है तो पहले रोग बढ़ता है। फिर धीरे-धीरे कम होने लगता है। आयुर्वेद में भी वमन, विरेचन और स्वेदन द्वारा शरीर में जमा विकार को बाहर निकाला जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में भी एनिमा और विभिन्न प्रकार के उपचार से शरीर की सफाई की जाती है। लेकिन एलोपैथी में ऐसा नहीं होता। रोग को दवाओं से दबा दिया जाता है। कुछ समय के लिए तो रोग चला गया ऐसा लगता है, लेकिन कुछ दिन बाद व्यक्ति नई शिकायत लेकर डाक्टर के पास पहुँच जाता है। तब डाक्टर उस रोग का इलाज करने लगता है। या कह देता है कि मैंने तो आपकी वह बीमारी ठीक कर दी, यह तो चर्म रोग है आप किसी स्कीन वाले डाक्टर को दिखाओ। तो व्यक्ति निरोग कहाँ हुआ? एक व्याधि से मुक्त कर आपने उसे दूसरी में उलझा दिया।

हम जब विपश्यना करते हैं, तब भी हमारे मन में संचित विकार संवेदनाओं के रूप में हमारे शरीर पर प्रकट होने लगते हैं। सुख और दुख की इन अनुभूतियों को समता में रहते हुए देख लिया तो ये सहज निकल जाती हैं और शरीर एकदम हल्का हो जाता है। असल में काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे संचित विकारों का विस्फोट ही बीमारी की शक्ल में देह पर प्रकट होता है। अगर हम समता में रहते हुए बीमारी के लक्षणों का सामना करें और कुछ नैसर्गिक उपचार पद्धतियों का सहारा ले लें तो धीरे-धीरे शरीर निरोग हो सकता है। शरीर पर खुजली उठी और समता में रहते हुए आपने उसे देखा तो कुछ देर बाद वह अपने आप मिट जाती है। जरा खुजलाना चालू किया तो फिर देखिए कैसे बढ़ती जाती है। तो हमें प्रति पल सजग और प्रति पल समता में रहना सीखना चाहिए। यह कला आती है विपश्यना से।

1 टिप्पणी:

  1. दुनिया को सरल बात कठिन लगती है , और कठिन बात समझ नहीं पाते है / शायद इसी लिए चतुर लोग सरल बातों को लोगो से छुपाते हैं, कठिन विषय समझाने के लिए विद्यालय चलाते है /

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