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बुधवार, 24 नवंबर 2010

सुखद मृत्यु

सुन कर चौंकिए मत। मृत्यु भी सुखद होती है। कभी-कभी हम किसी के यहाँ गमी पर बैठने जाते हैं। वह सब कुछ वृतांत सुनाता है। अच्छे भले थे, बड़े नियम-संयम से रहते थे। कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुए। रोज प्रातः घुमने जाते थे, योगासन करते थे। कोई रोग नहीं था। रात को सोए और सोए ही रह गए। अभी उम्र ही क्या थी, इतनी कम उम्र में भी क्या कोई जाता है? कुछ लोगों को सुन कर यह लग सकता है कि जब इतने नियम संयम से रहने पर भी अचानक ऐसी मौत तो फिर क्या फायदा, ऐसे नियम-संयम का? असल में यह नियम संयम का ही प्रताप है, कि उन्हें इतनी अच्छी मौत नसीब हुई।
कई लोग नाना प्रकार की बीमारियों और उनसे होने वाली तरह-तरह की पीड़ाओं के बाद बड़ी मुश्किल से प्राण तजते हैं। खुद भी परेशान होते हैं और परिवार को भी परेशानी होती है। इलाज पर बेहिसाब पैसा खर्च होता है सो अलग। अगर मुफ्त में इतनी अच्छी मौत नसीब हो तो क्या कहने। मौत तो सभी को आनी ही है। आप इलाज के लिए अमेरिका ले जाएं चाहे ब्रिटेन। निदा फाजली ने क्या खूब कहा है- कोई जल्दी तो कोई देर से जाने वाला। इसलिए ऐसी सुखद मौत पर रोने की अपेक्षा खुश होना चाहिए।
• काका कालेलकर ने तो सुखद मृत्यु शीर्षक से एक पुस्तक ही लिख डाली है। आचार्य विनोबा भावे ने भी मृत्यु को गाढ़ निंद्रा की संज्ञा दी है। विनोबाजी लिखते हैं-मनुष्य जब नींद में होता है तो वह एक तरह की मौत ही है। हम रोज कई दफा मरते हैं और जिंदा होते हैं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. हम भारतीयों को कहां मिल सकती है ... हमें तो नक्सली, भूंख, महंगाई, सरकार, भ्रष्टाचार और सरकारी नियम, पुलिस वगैरा हैं न..

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  2. हर दिन एक जीवन और निद्रा मौत...मै भी ऎसा ही सोचता हू... फिर डर किस बात का...यह बात और है कि उसी निद्रा से हमे जीने की ऊर्जा भी प्राप्त होती है...अपने चारो ओर ध्यान से देखे तो प्रकति के कण-कण मे जीवन और मौत विद्यमान है...

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