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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

पौष्टिक पोई को क्यों भूल गए


धन्यवाद किशोर भाई आपने पोई की बिसरी हुई याद दिलाई। मेरी माँ को पोई की भाजी बहुत पसंद थी। मैंने उनके लिए हमारे देपालपुर संवाददाता से बेल मँगवा कर बगीचे में लगाई थी। पोई की भाजी तो हमें उतनी नहीं भाती थी, लेकिन पकौड़े बड़े अच्छे लगते थे। बेसन के साथ भी अच्छी लगती थी। फिर पता नहीं कैसे वह बेल नष्ट हो गई और हम पोई को भूल गए। इधर भाजी वाले भी पोई ज्यादा नहीं लाते। नई पीढ़ी पसंद भी नहीं करती भाजी पाला। पुराने लोग भाजियों के औषधि गुण को खूब अच्छी तरह जानते थे। माँ बारिश के दिनों में पुवाड़िया की भाजी भी एक दो बार जरूर खाती थी। पुवाड़िया भी मैथी की तरह होता है। यह पेट के लिए बहुत लाभप्रद होता है। बारिश शुरू होते ही खरपतवार की तरह उग आता है। डा.किशोर पवार वनस्पति विज्ञान के प्राध्यापक हैं। उन्होंने नईदुनिया में प्रकाशित अपने आलेख में लिखा है कि पोई को इंडियन स्पींच भारतीय पालक कहते हैं। हम जो पालक खाते हैं वह ईरानी पालक है। पोई की बेल एक बार बगीचे में लगा दो तो बारह मास आपको मुफ्त में ताजा पालक मिल सकता है। इसमें पालक से अधिक पोषक गुण है। पालक में प्रति सौ ग्राम पर लौह तत्व 1.7 से 2.5 केल्शियम 28 केरोटिन 5580 और फासफोरस 21 मिलीग्राम है। पोई में इनकी मात्रा क्रमशः 10/87/7780 और 35 है। इसमें विटामिन ए/ बी/ सी भी पालक से ज्यादा है। पोई खाने से नींद भी अच्छी आती है अर्थात अनिंद्रा के रोगियों के लिए यह विशेष फायदेमंद है। पोई में रेशा भी अधिक होता है, इसलिए कब्ज दूर करती है। पालक में ई-कोलाई और साल्मोनेला जैसे बैक्टिरिया का संक्रमण हो सकता है। पोई में यह संक्रमण नहीं होता। इसे वियतनाम और चीन में भी खूब खाया जाता है। किशोर भाई द्वारा पेश यह ब्यौरा पढ़ कर लगा कि हम माँ के जाते ही पोई को भी भूल गए थे।

शनिवार, 19 मार्च 2011

सेहत के चार यार(drumstick)


इन दिनों में सहजन अर्थात सुरजने की भी बहार आती है। इसे अंग्रेजी में ड्रम स्टीक कहते हैं, क्योंकि इसकी फलियाँ ड्रम बजाने की स्टीक की तरह नजर आती हैं। सहजन का पेड़ भी पोषक तत्वों से भरपूर है। इसके फूल, पत्ते और फलियाँ सभी खाने के काम आते हैं। तमिलनाडु व केरल में सिद्ध औषधि शास्त्र में व आयुर्वेद में सहजन के अनेक गुणों का बखान है। इसकी पत्तियाँ बीटा केरोटिन, विटामीन सी और आयरन, पोटेशियम से भरपूर होती हैं। पत्तियों के एक चम्मच पावडर में 14 प्रतिशत प्रोटीन, 40 प्रतिशत केलशियम और 23 प्रतिशत आयरन अर्थात लोहा होता है। यह गर्भवती स्त्रियों व प्रसूता माताओं के लिए वरदान है। इसका तीन चम्मच पावडर अगर रोज ऐसी स्त्रियों को दिया जाए तो उन्हें और किसी पोषक दवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी। प्रसूता माताओं में इसके सेवन से दूध की वृद्धि होती है और दूध पोष्टिक होता है। यह ग्रामीण भारत में कुपोषण दूर करने में बड़ा सहायक हो सकता है। इसका पेड़ बड़ी आसानी से लग जाता है और ज्यादा देखभाल भी नहीं करनी पड़ती। पत्तियों का पालक की तरह साग बना कर खाया जा सकता है। फूलों की साग भी मशरुम जैसा जायका देती है। फलियाँ तो है ही स्वाद व सेहत से लबरेज। उबाल कर चाहें तो ऐसे ही खाएं या सब्जी बना कर या कड़ी में डाल कर खा सकते हैं। पत्तियों का सूखा पावडर सूप व सास में भी डाला जाता है। सब्जियों में भी डाल कर खाया जा सकता है। इसके बीजों से इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की दवाई भी बनती है। अर्थात यह यौन शक्तिवर्धक है। अगर आपके घर आँगन में थोड़ी सी खुली जमींन है, तो उसमें सेहत के चार यार अमरूद, आँवला, बेल और सहजन को जरूर स्थान दीजिए। यह आपकी दैहिक और आर्थिक दोनों सेहत को सुधार देंगे।