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गुरुवार, 22 मार्च 2012

तेलों का खेल और अलसी गुरु का मेल


तेलों के बारे में कुछ स्वर्णिम नियम हैं।

1-रिफाइन्ड तेल और हाइड्रोजिनेटेड तेल कभी भी प्रयोग नहीं करें।
2-भोजन बनाने में तलने की प्रक्रिया बंद करें। तलने के लिए सबसे अच्छा तेल पानी है। फिर भी दिल न माने तो तलने के लिए सेचुरेटेड तेल जैसे नारियल का एक्स्ट्रा वर्जिन तेल, घी या ऑलिव का एक्स्ट्रा वर्जिन तेल या तिल का अनरिफाइन्ड तेल प्रयोग करें।
3-बाजार में मिलने वाले अधिकतर तेल रिफाइन्ड और पार्शियली हाइड्रोजिनेटेड और ट्रांसफेट से भरपूर होते हैं।
4-तलने से बेक करना अच्छी प्रक्रिया है।
5-अलसी का कोल्ड-प्रेस्ड तेल अतिउत्तम है पर गर्म नहीं किया जाना चाहिये। इसे फ्रीज में रखें और कच्चा(दही या सलाद पर डाल कर)लेना चाहिये।
6-कॉलेस्ट्रोल और सेचुरेटेड फैट हमारे दुष्मन नहीं है। इसके सम्बन्ध में किया जाने वाला भ्रामक दुष्प्रचार खराब, सस्ते और रिफाइण्ड तेलों को बेचने का मार्केटिंग टूल है।
7-स्वस्थ रहने के लिए हमारे तेलों में ओमेगा-3 और ओमेगा-6 का अनुपात सन्तुलित (1:2) रहना चाहिये।
8-टीवी में दिखाये जाने वाले एड हमें शुद्ध रूप से बेवकूफ बनाते हैं।
9-बाजार में बिकने वाले सभी खुले या पेकेटबन्द खाद्य पदार्थ या फास्टफूड ट्रांसफेट से भरपूर रिफाइन्ड तेल और हाइड्रोजिनेटेड तेल से बनते हैं।
10-ट्रांसफेट से भरपूर रिफाइन्ड तेल और हाइड्रोजिनेटेड तेल हमें कई बीमारियों जैसे हार्ट, डाबिटीज, आर्थ्राइटिस, मोटापा, डिप्रेशन आदि का शिकार बनाते हैं।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

तेल और तड़का बिन माँगे रोग भड़का


आधुनिक समाज में हम हर चीज रिफाइंड करके खाते हैं। इस चक्कर में खाद्य पदार्थों के प्राकृतिक तत्व व गुण नष्ट हो जाते हैं। मसलन खाद्य तेलों को ही लीजिए। रिफाइंड करने के लिए इन्हें २०० से ५०० डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म किया जाता है। इससे इनका ओमेगा-३ वसा अम्ल जिसे अल्फा लिनोलेनिक एसिड के वैज्ञानिक नाम से भी जाना जाता है, पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
फिर तेल को रंगहीन व गंधहीन बनाने के लिए घातक रसायन जैसे कास्टिक सोड़ा, फास्फोरिक एसिड, ब्लीचिंग क्लेज का प्रयोग किया जाता है। सामान्य तरीके से तिलहन से तेल निकालने पर उनमें ७ प्रतिशत अंश रह जाता है। इस सात प्रतिशत को भी निचोड़ने के उद्देश्य से तेल में घातक पेट्रोलियम पदार्थ साल्वेंट हेक्जेन मिलाया जाता है। पूरा तेल निकलने पर तेल को उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। इस तरह बेदम तेल खूबसूरत पैकिंग में उपभोक्ताओं को लुभावने सपनों के विज्ञापनों के साथ बेच दिया जाता है।
पुराने समय में कच्ची घानी से तेल निकाल कर उसका उपयोग खाने के लिए किया जाता था। जो खली निकलती थी, उसमें सात प्रतिशत तेल का बचा अंश हमारे दुधारु पशुओं का आहार बनता था। अब तो न मानव को वह शुद्ध तेल नसीब है न पशुओं को तेल वाली खली। प्रसिद्ध वैज्ञानिक यूडो इरेस्मस ने एक पुस्तक लिखी है-Fats that Heals fats that Kills. इस पुस्तक की दो लाख से ज्यादा प्रतियाँ बिक चुकी हैं। इसमें ऐसे तेलों की ही पोल खोली है। विस्तार से चाहें तो वेबसाइट WWW.udoerasmus.com तथा http;/flaxindia.blogspot.com पर जा सकते हैं।
अब जरा बाजार में मिलने वाले हमारे नमकीनों के बारे में विचार कीजिए, जिन्हें चटखारे लेकर आप मजे से रोज खाते हैं। नमकीन बनाने वाले इन रिफाइंड तेलों का ही तो इस्तेमाल करते हैं। और कढ़ाई में बार-बार उस तेल को उबालते रहते हैं। ऐसे विषाक्त और निर्जीव तेल में तले पदार्थ भला मनुष्य को क्या देते होंगे? सिवा क्षणिक स्वाद के बाकी सब रोगों का घर है।
प्रसिद्ध चिकित्सक डा.ओपी वर्मा जो अलसी के भारत में स्टार प्रचारक हैं ने लिखा है कि गृहणियों को तेल में तड़का लगाना और तलना बंद ही कर देना चाहिए। तेल, तलना और तड़का अर्थात बिन माँगे रोग भड़का।